Ziyarat E Nahiya In Hindi ((free))
"सलाम हो हुसैन पर, जिन्होंने अपनी जान अल्लाह की राह में कुर्बान कर दी। सलाम हो उस पर जिसकी छिपी और ज़ाहिर इबादत अल्लाह के लिए थी। सलाम हो उस पर जिसके ख़ून से मिट्टी पाक हो गई।"
इमाम महदी (अ.स.) इसमें अपने दादा के जिस्म पर लगे तीरों और तलवारों के घावों का ज़िक्र करते हैं।
5. ज़ियारत-ए-नाहिया कब और कैसे पढ़ें?
'ज़ियारत' का अर्थ होता है मुलाकात करना या किसी पवित्र स्थान पर जाना, जबकि 'नाहिया' शब्द से लिया गया है। यह नाम शिया मुस्लिम परंपरा में छिपाकर इमाम महदी (अतफ़एस) के लिए इस्तेमाल किया जाता था। ziyarat e nahiya in hindi
3. कर्बला के मंज़र का ज़िक्र
ज़ियारत-ए-नाहिया का अर्थ है "नाहिया की यात्रा"। नाहिया का अर्थ है "दूरी" या "दूर का स्थान"। यह यात्रा इमाम हुसैन के मकबरे पर जाकर की जाती है, जो कर्बला में स्थित है। यह यात्रा शिया मुसलमानों के लिए बहुत पवित्र मानी जाती है, क्योंकि इमाम हुसैन शिया मुसलमानों के तीसरे इमाम थे और उन्होंने अपने परिवार के साथ कर्बला में शहीद हो गए थे।
किबला रुख होकर या कर्बला की दिशा में रुख करके अदब के साथ बैठें। including any personal information you added.
इस ज़ियारत को मुख्य रूप से चार-पांच भागों में बाँटा जा सकता है, जो इसके विस्तृत और प्रभावशाली होने का प्रमाण देते हैं :
It is recommended to recite Ziyarat-e-Nahiya on the Day of Ashura, which falls on the 10th of Muharram. Shia Muslims around the world recite this ziyarat in congregation, often in masjids (mosques) or husseiniyas (Shi'ite religious centers). The ziyarat is usually recited after the Maghrib (sunset) prayer.
"अगरचे ज़माने ने मुझे देर से पैदा किया और मैं कर्बला में आपकी मदद न कर सका... तो मैं सुबह व शाम आपके दुःख में आंसू बहाता हूँ। और अगर मेरे आंसू सूख जाएं, तो मैं आंसुओं की जगह खून के आंसू रोऊंगा।" "सलाम हो हुसैन पर
इसकी शुरुआत हज़रत आदम (A.S.) से लेकर हज़रत मुहम्मद (S.A.W.W.) तक के महान पैगंबरों को सलाम भेजने से होती है .
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ज़ियारत-ए-नाहिया का हिन्दी तर्जुमा और इबादत (मुख्य अंश)
ज़ियारत-ए-नाहिया सिर्फ एक दुआ या पाठ नहीं है; यह एक है जो 12वें इमाम (अ.स.) ने अपने नाना इमाम हुसैन (अ.स.) के नाम लिखा। यह हमें सिखाती है कि जुल्म के खिलाफ खड़ा होना ईमान है, और मुहब्बत में रोना इबादत है।
यूं तो ज़ियारत-ए-नाहिया साल में कभी भी पढ़ी जा सकती है, लेकिन के दिन इसका पढ़ना विशेष महत्व रखता है। इसे पढ़ने के लिए: